ब्रेकिंग: डोहरी के पहाड़ों पर अवैध खनन का खेल! अस्तित्व बचाने की चुनौती
● जंगल और पर्यावरण पर मंडरा रहा संकट, प्रशासन की भूमिका पर उठे सवाल
पाकुड़/लिट्टीपाड़ा : जिले के लिट्टीपाड़ा प्रखंड अंतर्गत डोहरी संथाली गांव के पहाड़ों में कथित तौर पर बड़े पैमाने पर अवैध पत्थर खनन किए जाने का मामला सामने आया है। प्राकृतिक संपदा और घने जंगलों से घिरे इस क्षेत्र में लगातार हो रही पत्थर कटाई ने ग्रामीणों की चिंता बढ़ा दी है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि पहाड़ियों को काटकर खुलेआम पत्थरों का अवैध उत्खनन और परिवहन किया जा रहा है, जिससे न सिर्फ पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है बल्कि जंगलों का अस्तित्व भी खतरे में पड़ता जा रहा है।
ग्रामीणों के अनुसार डोहरी संथाली गांव के आसपास स्थित कई पहाड़ी इलाकों में लंबे समय से अवैध खनन का कार्य जारी है। आरोप है कि जंगल के भीतर मशीनों की आवाज दिन-रात सुनाई देती है और रात के अंधेरे से लेकर सुबह तक ट्रैक्टर एवं अन्य भारी वाहनों के माध्यम से पत्थरों की ढुलाई की जाती है। ग्रामीणों का कहना है कि लगातार हो रही खुदाई के कारण कई स्थानों पर पहाड़ों का स्वरूप बदलने लगा है और बड़े-बड़े गड्ढे बन गए हैं।
स्थानीय लोगों ने आशंका जताई है कि यदि इसी तरह खनन जारी रहा तो आने वाले वर्षों में डोहरी के पहाड़ अपनी प्राकृतिक पहचान खो देंगे। ग्रामीणों का कहना है कि पहाड़ों की कटाई से जंगल तेजी से प्रभावित हो रहे हैं, जिससे जैव विविधता और वन्य जीवों के प्राकृतिक आवास पर भी संकट गहराने लगा है। बरसात के दिनों में मिट्टी कटाव और भू-स्खलन जैसी घटनाओं की संभावना भी बढ़ सकती है।
मामले को लेकर सबसे बड़ा सवाल प्रशासनिक निगरानी पर उठ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि इतने बड़े स्तर पर यदि अवैध खनन हो रहा है तो संबंधित विभागों और प्रशासन की नजर इस पर क्यों नहीं पड़ रही। लोगों के बीच यह चर्चा भी है कि बिना किसी संरक्षण या मिलीभगत के इतने बड़े स्तर पर अवैध खनन संभव नहीं हो सकता। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
ग्रामीणों ने जिला प्रशासन, खनन विभाग एवं वन विभाग से मामले की निष्पक्ष जांच कर अवैध खनन पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है। साथ ही दोषियों पर कड़ी कार्रवाई और प्रभावित पहाड़ी क्षेत्रों का निरीक्षण कराने की अपील की है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो वे आंदोलन और जनविरोध प्रदर्शन करने को मजबूर होंगे।
अब देखने वाली बात यह होगी कि प्रशासन डोहरी के पहाड़ों और जंगलों को बचाने के लिए कितनी तत्परता दिखाता है, या फिर पत्थर माफियाओं का यह कथित खेल यूं ही चलता रहेगा।
