Raja Sankranti 2025: राजस संक्रांति पर्व है महिलाओं के सम्मान का प्रतीक
आज राजस संक्रांति है, इसे राजा संक्रांति भी कहा जाता है। यह ओडिशा का एक पारंपरिक त्योहार है जो मुख्य रूप से लड़कियों और महिलाओं से जुड़ा है। यह तीन दिनों तक मनाया जाता है, और इस दौरान प्रकृति, धरती माता और नारी शक्ति का सम्मान किया जाता है तो आइए हम आपको राजस संक्रांति व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।
जानें राजस संक्रांति के बारे में
राजा संक्रांति, जिसे रज पर्व के नाम से भी जाना जाता है, ओडिशा का एक प्रमुख और पारंपरिक त्योहार है, जो तीन दिनों तक बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह पर्व मुख्य रूप से भगवान विष्णु की पत्नी भूमा देवी की अराधना को समर्पित है। मान्यता है कि इस दौरान पृथ्वी माता रजस्वला होती हैं, इसलिए इस अवधि को प्रकृति और स्त्री शक्ति का उत्सव माना जाता है। यह त्योहार ओडिशा की संस्कृति और सामाजिक एकता को दर्शाता है। यह त्योहार महिलाओं और धरती माता के प्रति सम्मान व्यक्त करता है। यह त्योहार का दूसरा दिन है और इसे मिथुन संक्रांति भी कहा जाता है। यह माना जाता है कि इस दिन सूर्य मिथुन राशि में प्रवेश करता है। इस दिन, धरती माता की पूजा की जाती है और उन्हें फल चढ़ाए जाते हैं। यह त्योहार ओडिशा में बहुत उत्साह और खुशी के साथ मनाया जाता है। 14 जून से 16 जून तक मनाया जाने वाला रज पर्व एक भारतीय सांस्कृतिक अवकाश है, जिसमें नारीत्व का जश्न मनाया जाता है। पहले दिन को ‘पहिली राजा’ कहा जाता है, दूसरे दिन को ‘मिथुन संक्रांति’ कहा जाता है, और तीसरे दिन को ‘भुदाहा’ या ‘बासी राजा’ कहा जाता है।
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राजस संक्रांति का महत्व
रज पर्व मानसून की शुरुआत और पृथ्वी की नारीत्व का जश्न मनाने वाला एक अनूठा त्योहार है। पंडितों के अनुसार इन तीन दिनों में धरती माता को आराम दिया जाता है, जैसे महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान आराम की आवश्यकता होती है। इसे राजा संक्रांति या राजा पर्व भी कहा जाता है।
राजा संक्रांति की पौराणिक कहानी भी है रोचक
रज पर्व के पीछे एक सुंदर और गहराई से जुड़ी हुई पौराणिक मान्यता है। कहा जाता है कि इस दौरान धरती माता यानी देवी पृथ्वी, जो भगवान विष्णु की पत्नी ‘भूमा देवी’ के रूप में जानी जाती हैं, मासिक धर्म (रजस्वला) से गुजरती हैं। ओड़िया भाषा में ‘रज’ शब्द का अर्थ होता है मासिक धर्म, और यह शब्द ‘रजस्वला’ से निकला है, जिसका मतलब होता है – मासिक धर्म वाली महिला। रज पर्व, स्त्री के इसी प्राकृतिक चक्र को न सिर्फ मान्यता देता है, बल्कि उसे सम्मान और उत्सव का रूप भी देता है।
रज पर्व या राजस संक्रांति का अर्थ भी है खास
रज पर्व ओडिशा का एक पारंपरिक और खास त्योहार है, जो मुख्यतः लड़कियों और महिलाओं से जुड़ा होता है। यह तीन दिनों तक मनाया जाता है, और इन तीन दिनों में प्रकृति, धरती माता और नारी शक्ति का सम्मान किया जाता है। त्योहार की शुरुआत से एक दिन पहले ‘सजबाज’ होता है, जिसमें तैयारियां शुरू हो जाती हैं। पहले दिन को ‘पहिली रज’, दूसरे दिन को ‘मिथुन संक्रांति’ और तीसरे दिन को ‘भू दाह’ या ‘बसी रज’ कहा जाता है। इस पर्व में अविवाहित लड़कियों के लिए विशेष महत्व होता है। वे अच्छे कपड़े पहनती हैं, सजती-संवरती हैं और पारंपरिक व्यंजन जैसे पोड़ा पीठा खाती हैं। इस दौरान वे नंगे पांव चलने से बचती हैं और झूले पर झूलना बहुत शुभ माना जाता है। घरों के आंगनों या पेड़ों की डालियों पर रस्सियों के झूले बांधकर झूलने की परंपरा इस पर्व की सबसे खास पहचान है। रज पर्व के दौरान कोई भी ऐसा काम नहीं किया जाता जिसमें जमीन की खुदाई हो– जैसे खेती, निर्माण या खुदाई आदि। इसका उद्देश्य धरती माता को आराम देना होता है। यह मान्यता है कि जैसे महिलाओं को मासिक धर्म के समय आराम की आवश्यकता होती है, वैसे ही धरती मां को भी विश्राम मिलना चाहिए।
जानें रज पर्व का शुभ मुहूर्त
राजा संक्रांति आमतौर पर ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को शुरू होता है और तीन दिनों तक चलता है। 2025 में यह पर्व 14 जून को शुरू होगा और 16 जून तक मनाया जाएगा। पहले दिन को ‘पहिली राजा’ कहते हैं, दूसरा दिन ‘राजा संक्रांति’ और तीसरा दिन ‘भू-दौ’ या ‘वसुमती स्नान’ कहलाता है। इस दौरान खेती-बाड़ी का काम बंद रहता है, क्योंकि यह समय पृथ्वी को विश्राम देने का माना जाता है। राजा संक्रांति आमतौर पर ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को शुरू होता है और तीन दिनों तक चलता है। 2025 में यह पर्व 14 जून को शुरू होगा और 16 जून तक मनाया जाएगा। पहले दिन को ‘पहिली राजा’ कहते हैं, दूसरा दिन ‘राजा संक्रांति’ और तीसरा दिन ‘भू-दौ’ या ‘वसुमती स्नान’ कहलाता है। इस दौरान खेती-बाड़ी का काम बंद रहता है, क्योंकि यह समय पृथ्वी को विश्राम देने का माना जाता है।
राजस संक्रांति पर निर्माण कार्य पर लगती है रोक
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दौरान, कोई भी निर्माण कार्य, खुदाई या खेती, नहीं की जाती है क्योंकि इस समय धरती आराम कर रही होती है।
राजस संक्रांति पर होता है महिलाओं का सम्मान
इस त्यौहार में महिलाओं का सम्मान किया जाता है इसलिए इस दौरान, लड़कियां पारंपरिक कपड़े पहनती हैं, सजती-संवरती हैं, और झूले झूलती हैं। त्योहार से एक दिन पहले, “सजबाज” होता है, जिसमें तैयारियां शुरू हो जाती हैं। झूले इस त्योहार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, और विभिन्न प्रकार के झूले बनाए जाते हैं।
इस अवसर पर बनाए जाते हैं पारंपरिक व्यंजन
ओड़ीसा में मनाए पोड़ा पीठा जैसे पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं और खाए जाते हैं। इस दौरान अधिकतर घरों में विविध प्रकार के पकवान बनाए जाते हैं।
– प्रज्ञा पाण्डेय

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