Guru purnima 2026: गुरु पूर्णिमा पर्व है आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण
आज गुरु पूर्णिमा है, गुरु पूर्णिमा का हिन्दू धर्म में विशेष महत्व है। गुरु पूर्णिमा पर किए गए अनेक उपाय को करने से दरिद्रता दूरी होती है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है तो आइए हम आपको गुरु पूर्णिमा पर्व का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।
जानें गुरु पूर्णिमा व्रत के बारे में
हिंदू परंपरा में आषाढ़ माह की पूर्णिमा को आने वाली गुरु पूर्णिमा का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना जाता है। यह दिन गुरु के प्रति आभार, सम्मान और समर्पण व्यक्त करने का अवसर होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गुरु के मार्गदर्शन से ही जीवन में सही दिशा, ज्ञान और सफलता प्राप्त होती है। इसलिए इस दिन शिष्य अपने गुरु के चरणों में श्रद्धा अर्पित करते हैं और उनका आशीर्वाद लेते हैं, जिससे जीवन में सुख-समृद्धि और उन्नति के द्वार खुलते हैं।
इसे भी पढ़ें: Ashadha Purnima 2026: गुरु पूर्णिमा पर बना दुर्लभ योग, जानिए शुभ Muhurat और पूजा की विधि
यह महापर्व उस गुरु को समर्पित होता है जो अपने शिष्य को अंधकार से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाता है। गुरु पूर्णिमा का पर्व न सिर्फ धार्मिक बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत ज्यादा मायने रखता है। हिंदू मान्यता के अनुसार गुरू पूर्णिमा के पर्व पर यदि पूजा से जुड़े कुछेक उपायों को श्रद्धा और विश्वास के साथ किया जाए तो न सिर्फ सिद्ध संतों का आशीर्वाद बल्कि सुख-सौभाग्य की भी प्राप्ति भी होती है।
व्यास पूर्णिमा के नाम से भी प्रसिद्ध है गुरु पूर्णिमा
हिन्दू धर्म में गुरु पूर्णिमा महान ऋषि वेद व्यास जी के जन्मदिवस और उनके द्वारा चारों वेदों के संकलन के उपलक्ष्य में भी मनाया जाता है। उन्होंने महाभारत और पुराणों की रचना कर मानवता को ज्ञान का अनमोल खजाना दिया, इसीलिए उनके सम्मान में इसे ‘व्यास पूर्णिमा’ कहा जाता है। गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि इसी तिथि पर महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। वेदव्यास को हिंदू धर्मग्रंथों का संकलनकर्ता और महान गुरु माना जाता है। इस वर्ष गुरु पूर्णिमा 29 जुलाई को मनाई जाएगी। इस पावन अवसर पर लोग अपने गुरु को प्रसन्न करने के लिए उपहार भी अर्पित करते हैं। यह उपहार केवल वस्तु नहीं, बल्कि सम्मान और कृतज्ञता का प्रतीक होता है। यदि उपहार गुरु की पसंद या उनकी राशि के अनुसार दिया जाए, तो उसका महत्व और भी बढ़ जाता है। गुरु पूर्णिमा का महत्व सिर्फ़ एक धर्म तक ही सीमित नहीं है, बल्कि भारत के तीन प्रमुख धर्मों हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म में भी इसका बहुत महत्व है। यह त्योहार हमारे गुरुओं या शिक्षकों की शिक्षाओं और उनके प्रयासों के सम्मान में मनाया जाता है। अगर हमारे मन में ज्ञान न भरा गया होता, तो हम सिर्फ़ मांस और हड्डियों का ढांचा ही होते।
गुरु पूर्णिमा का जश्न सिर्फ़ स्कूल-कॉलेज के शिक्षकों या साधुओं तक ही सीमित नहीं है। कोई भी व्यक्ति शिक्षक हो सकता है चाहे वह आपकी मां हों जिन्होंने आपको चलना सिखाया, या आपका दोस्त जिसने आपको कोई वाद्य यंत्र या खेल सिखाया। असल में, यही असली “टीचर्स डे” (शिक्षक दिवस) है। हालांकि गुरु पूर्णिमा का महत्व सभी धर्मों के लिए एक जैसा है, लेकिन इससे जुड़ी कहानियां अलग-अलग हैं।
गुरु पूर्णिमा पर पीपल के पेड़ के नीचे जलाएं दीया, होगा लाभ
पंडितों के अनुसार सनातन परंपरा में तुलसी के पौधे का संबंध धन की देवी मां लक्ष्मी से माना गया है, वहीं पीपल के पेड़ में श्री हरि का वास माना गया है। ऐसे में साधक को गुरु पूर्णिमा वाले दिन पीपल के पेड़ में जल अर्पित करने के बाद शुद्ध देशी घी का दीया जलाना चाहिए। इस उपाय से साधक को श्री हरि संग माता लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
गुरु पूर्णिमा पर देवालय पर दीया जलाना होता है शुभ
हिंदू मान्यताओं के अनुसार गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के मंदिर में जाकर शुद्ध देशी घी का दीया जलाने से उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है। देवालयों में इस प्रकार दीए जलाने से जीवन के सभी दुख दूर और सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
गुरु पूर्णिमा व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा भी है रोचक
शास्त्रों में वर्णित गुरु पूर्णिमा की पौराणिक कथा बहुत रोचक है। इस पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में एक बार भ्रमण के लिए महर्षि पराशर निकले थे। इस दौरान उनकी नजर एक महिला पर पड़ी, जिसका नाम सत्यवती था। वह एक मछुआरे की बेटी थी, वह अधिक खूबसूरत थी। उसके शरीर में से मछली की गंध आती रहती थी, क्योंकि उसका जन्म मछुआरे के घर हुआ था। इसलिए उन्हें मत्स्यगंधा भी कहा जाता था। ऋषि उसे देखकर व्याकुल हो गए, लेकिन पराशर ऋषि ने सत्यवती से संतान प्रदान करने की इच्छा जाहिर की। ऋषि की ये बात सुनकर सत्यवती ने अधिक आश्चर्यचकित होकर कहा कि मैं इस तरह से अनैतिक संबंध कैसे बना सकती हूं। इस तरह से संतान का जन्म लेना व्यर्थ है। ऐसे में ऋषि ने कहा कि जो संतान तुम्हारी कोख से जन्म लेगी। वह पूरे संसार के लिए महान काम करेगी। ऋषि की बात को सत्यवती ने मान लिया, लेकिन उसनें पहले ऋषि के सामने अपनी तीन शर्त रखी। पहली शर्त यह कि संभोग क्रीडा करते समय कोई न देखें। दूसरी शर्त में कहा कि होने वाला बच्चा महान ज्ञानी होने के साथ मेरी कौमार्यता को जीवन में कभी भंग न करे। वहीं, तीसरी शर्त थी कि शरीर से आने वाली गंध फूलों की खुशबू में बदल जाएं। इसके बाद सत्यवती की कोख से एक बेटे का जन्म हुआ, जिसका नाम द्वैपायन रखा था जो आगे चलकर वेदव्यास कहलाएं।धार्मिक मान्यता के अनुसार, महर्षि वेदव्यास का जन्म आषाढ़ माह की पूर्णिमा को हुआ। उन्हें महाभारत, अठारह पुराणों, ब्रह्मसूत्र, मीमांसा जैसे अद्वितीय वैदिक साहित्य दर्शन के रचयिता माना जाता है।
भगवान शिव ने सप्तऋषियों को चुना शिष्य
पुराणों के अनुसार शिव ने सप्तर्षियों को तुरंत ज्ञान नहीं दिया था। उन्होंने उन ऋषियों की कई वर्षों की कठोर तपस्या, धैर्य और अटूट पात्रता को देखा। जब सप्तर्षि पूर्णतः ‘खाली’ और ग्रहणशील हो गए, तब पहली गुरु पूर्णिमा के दिन शिव ने उन्हें योग की सूक्ष्मताएं सिखाईं।
गुरु पूर्णिमा का आध्यात्मिक महत्व
पडिंतों के अनुसार गुरु पूर्णिमा का अर्थ है गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना। यह दिन शिष्य के लिए पुनर्जन्म के समान है। पूर्णिमा का चंद्रमा पूर्णता का प्रतीक है, और गुरु पूर्णिमा हमें याद दिलाती है कि गुरु के सान्निध्य में हमारा जीवन भी ज्ञान के प्रकाश से पूर्ण हो सकता है।
– प्रज्ञा पाण्डेय
