Karwa Chauth 2026: प्रेम, विश्वास और अखंड सौभाग्य का पर्व है करवा चौथ
भारत की सांस्कृतिक परंपराओं में करवाचौथ का विशेष स्थान है। यह केवल एक व्रत नहीं, बल्कि प्रेम, समर्पण, विश्वास और दांपत्य जीवन की मंगलकामना का प्रतीक है। उत्तर भारत में विशेष रूप से लोकप्रिय यह पर्व पति की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और वैवाहिक जीवन की खुशहाली की कामना के साथ मनाया जाता है। बदलते समय में करवाचौथ का स्वरूप भी व्यापक हुआ है और अब अनेक पति भी अपनी पत्नी के साथ व्रत रखकर परस्पर प्रेम और समान भागीदारी का संदेश देते हैं।
कब मनाया जाता है करवाचौथ?
करवाचौथ का व्रत हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है। यह पर्व सामान्यतः अक्टूबर या नवंबर में पड़ता है। हालांकि, कुछ पंचांगों में मास-गणना की परंपरा के कारण इसे आश्विन कृष्ण चतुर्थी से भी जोड़ा जाता है। इस वर्ष यह पर्व 29 अक्टूबर को पड़ रहा है।
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इस दिन विवाहित महिलाएं प्रातः सूर्योदय से पहले सरगी ग्रहण करती हैं और उसके बाद चंद्रोदय तक निर्जला व्रत रखने की परंपरा निभाती हैं। शाम को भगवान गणेश, माता पार्वती, भगवान शिव और कार्तिकेय की पूजा की जाती है। रात में चंद्रमा को अर्घ्य देकर पति के दर्शन के बाद व्रत खोला जाता है।
व्रत के नियम और पूजन विधि
करवाचौथ के दिन प्रातःकाल स्नान के बाद व्रत का संकल्प लिया जाता है। सूर्योदय से पहले सास अपनी बहू को सरगी देती हैं, जिसमें फल, मिठाइयां, मेवे और अन्य खाद्य पदार्थ शामिल होते हैं। इसके बाद व्रती महिलाएं दिनभर भोजन और जल का त्याग करती हैं। हालांकि, निर्जला व्रत धार्मिक परंपरा है, अनिवार्यता नहीं; स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने पर चिकित्सकीय सलाह को प्राथमिकता देनी चाहिए।
शाम को महिलाएं लाल, गुलाबी या अन्य शुभ रंगों के वस्त्र पहनकर सोलह शृंगार करती हैं। पूजा के लिए करवा यानी मिट्टी या धातु के पात्र में जल भरकर रखा जाता है। भगवान गणेश, माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा की जाती है। रोली, अक्षत, दीपक, पुष्प, मिठाई और सुहाग सामग्री अर्पित करने के बाद करवाचौथ की कथा सुनी जाती है। रात में चंद्रमा निकलने पर अर्घ्य दिया जाता है और छलनी से चंद्र दर्शन करने के बाद पति का चेहरा देखा जाता है। इसके पश्चात पति के हाथों से जल ग्रहण करके व्रत खोला जाता है।
करवाचौथ की पौराणिक कथा
करवाचौथ की सबसे प्रचलित कथा वीरवती नामक एक पतिव्रता स्त्री की है। वीरवती अपने सात भाइयों की इकलौती बहन थी। विवाह के बाद उसने पहली बार करवाचौथ का व्रत रखा। भूख-प्यास से व्याकुल बहन की हालत देखकर उसके भाइयों ने छलपूर्वक एक पेड़ के पीछे अग्नि जलाकर उसे चंद्रमा निकलने का आभास कराया। वीरवती ने उसे चंद्रमा समझकर व्रत खोल लिया। कथा के अनुसार, इसके बाद उसे पति के संकटग्रस्त होने का समाचार मिला। वह अत्यंत दुखी हुई और पूरे श्रद्धाभाव से देवी की आराधना करने लगी। अंततः उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर देवी ने उसके पति को पुनः जीवन प्रदान किया। इस कथा का संदेश है कि श्रद्धा, धैर्य और संकल्प जीवन की कठिन परिस्थितियों में संबल बनते हैं।
धार्मिक और सामाजिक महत्त्व
पौराणिक मान्यताओं में माता पार्वती को अखंड सौभाग्य और आदर्श दांपत्य का प्रतीक माना गया है। भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा के माध्यम से वैवाहिक सुख, प्रेम और पारिवारिक समृद्धि की कामना की जाती है। चंद्रमा को अर्घ्य देना मन की शांति और शुभता से भी जोड़ा जाता है।
वास्तव में करवाचौथ का सबसे सुंदर पक्ष पति-पत्नी के बीच परस्पर विश्वास, सम्मान और समर्पण है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि दांपत्य जीवन केवल अधिकारों से नहीं, बल्कि एक-दूसरे की चिंता, सहयोग और भावनात्मक जुड़ाव से मजबूत होता है। समय के साथ बदलती परंपराओं के बीच करवाचौथ आज भी भारतीय संस्कृति में प्रेम और पारिवारिक एकता का उत्सव बना हुआ है।
– शुभा दुबे
