Dasha Mata Vrat: सुहागिनें क्यों रखती हैं दशा माता का व्रत? जानें कैसे बदल सकती है घर की स्थिति और परिवार का भाग्य

हिंदू पंचांग के मुताबिक, प्रत्येक वर्ष चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को दशा माता का व्रत रखा जाता है। इस बार यह व्रत तिथि 13 मार्च को पड़ रही है। माता दशा को मां पार्वती का रुप माना जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं माता दशा की विधिवत पूजा करने के साथ 10 गांठ वाला सूत के धागे से बना पीपल के वृक्ष पर अर्पित किए जाते हैं और पूजा के बाद इसे गले में पहन जाता है। दशा माता कू पूजा करने से सुख-समृद्धि, धन-संपदा और खुशहाली की प्राप्ति होती है। इस दिन दशा माता की व्रत कथा जरुर पढ़नी चाहिए।
दशा माता व्रत 2026 तिथि
हिंदू पंचांग के अनुसार, चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि 13 मार्च 2026 की सुबह 6 बजकर 28 मिनट से आरंभ होगा, जो मार्च 2026 की सुबह 8 बजकर 10 मिनट पर समाप्त होगा। ऐसे में दशा माता का व्रत 13 मार्च, दिन शुक्रवार को रखा जाएगा। 
दशा माता की व्रत कथा
दशा माता की कथा के अनुसार प्राचीन समय में नल नाम के एक राजा थे और उनकी पत्नी का नाम दमयंती था। उनके राज्य में प्रजा बहुत सुख और शांति से जीवन व्यतीत करती थी। एक दिन एक ब्राह्मणी रानी के पास आई, जिसके गले में पीले रंग का डोरा बंधा हुआ था। रानी ने उत्सुकता से उस डोरे के बारे में पूछा। तब ब्राह्मणी ने बताया कि यह डोरा दशा माता का है और इसे धारण करने से घर में सुख, समृद्धि और अन्न-धन की कभी कमी नहीं होती। यह कहकर उसने रानी को भी एक डोरा दिया, जिसे रानी ने श्रद्धा से अपने गले में बांध लिया।
कुछ समय बाद राजा ने रानी के गले में बंधा हुआ डोरा देखा और उसके बारे में पूछा। रानी ने पूरी बात उन्हें बता दी। यह सुनकर राजा ने कहा कि जब हमारे पास सब कुछ है तो इस डोरे की क्या आवश्यकता है, इसलिए इसे उतारकर फेंक दो। रानी ने इसे तोड़ने से इंकार कर दिया, लेकिन राजा ने क्रोध में आकर वह डोरा तोड़कर फेंक दिया। रानी ने दुखी होकर कहा कि आपने अच्छा नहीं किया। उसी रात राजा को स्वप्न में एक वृद्धा दिखाई दी, जो वास्तव में दशा माता थीं। उन्होंने कहा कि अब तुम्हारी अच्छी दशा समाप्त होकर बुरी दशा शुरू होने वाली है, क्योंकि तुमने मेरा अपमान किया है। इतना कहकर वह अंतर्ध्यान हो गईं।
इसके बाद से ही राजा का सुख-समृद्धि से भरा जीवन धीरे-धीरे संकटों से घिरने लगा। राज्य का वैभव समाप्त हो गया और हालात इतने खराब हो गए कि भोजन के लिए भी संघर्ष करना पड़ा। ऐसी स्थिति देखकर राजा ने रानी से कहा कि तुम बच्चों को लेकर अपने मायके चली जाओ। लेकिन रानी ने स्पष्ट कहा कि वह अपने पति को छोड़कर कहीं नहीं जाएगी और हर परिस्थिति में उनका साथ निभाएगी। तब दोनों ने अपना राज्य छोड़कर दूसरे देश जाने का निर्णय लिया ताकि वहां कोई काम करके जीवन चला सकें।
रास्ते में उन्हें एक भील राजा का महल मिला, जहां उन्होंने अपने दोनों बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए छोड़ दिया। आगे बढ़ते हुए वे राजा के एक मित्र के गांव पहुंचे। मित्र ने उनका बहुत सम्मान किया और उन्हें भोजन करवाकर अपने शयनकक्ष में विश्राम करने को कहा। उसी कमरे में एक खूंटी पर उसकी पत्नी का कीमती हीरों का हार टंगा हुआ था। रात में रानी की आंख खुली तो उन्होंने देखा कि वह खूंटी मानो जीवित होकर हार को निगल रही है। यह देखकर रानी ने राजा को जगाया। दोनों को चिंता हुई कि सुबह हार के बारे में क्या जवाब देंगे, इसलिए वे रात में ही वहां से निकल गए।
सुबह जब मित्र की पत्नी ने हार को गायब देखा तो उसने संदेह किया कि राजा-रानी उसे लेकर चले गए हैं, हालांकि मित्र को अपने मित्र की ईमानदारी पर भरोसा था। आगे चलने पर राजा की बहन का गांव आया। बहन को जब उनके आने की खबर मिली तो उसने उनकी स्थिति के बारे में पूछा। जब उसे पता चला कि वे बहुत कठिन हालात में हैं, तो वह कांदा-रोटी लेकर मिलने आई। राजा ने अपना हिस्सा खा लिया, लेकिन रानी ने उसे जमीन में गाड़ दिया।
फिर आगे बढ़ते हुए उन्हें एक नदी मिली। राजा ने कुछ मछलियां पकड़कर रानी को भूनने के लिए दीं और खुद पास के गांव से भोजन लेने चले गए। उस गांव में एक सेठ लोगों को भोजन करा रहा था, जहां से राजा परोसा लेकर लौटे। लेकिन रास्ते में एक चील ने झपट्टा मारकर सारा भोजन गिरा दिया। उधर रानी जब मछलियां भूनने लगी तो वे अचानक जीवित होकर वापस नदी में चली गईं। दोनों ही मन में एक-दूसरे के बारे में गलतफहमी से दुखी हो गए, लेकिन बिना कुछ कहे आगे बढ़ गए।
आखिरकार वे रानी के मायके पहुंचे। वहां राजा ने रानी से कहा कि तुम महल में दासी बनकर काम कर लो और मैं भी गांव में कोई काम कर लूंगा। रानी महल में दासी बनकर रहने लगी और राजा तेली के घाने पर काम करने लगे। कुछ समय बाद होली दसा का दिन आया। उस दिन रानियों के साथ दासी ने भी स्नान किया। जब राजमाता उसके बाल संवारने लगीं तो उन्होंने उसके सिर पर पद्म का चिन्ह देखा और भावुक होकर रोने लगीं, क्योंकि उनकी बेटी के सिर पर भी ऐसा ही चिन्ह था। तब दासी ने बताया कि वह उनकी वही बेटी दमयंती है, जो दशा माता के प्रकोप के कारण ऐसी स्थिति में आ गई है।
यह सुनकर राजमाता ने उसे गले लगा लिया और जमाई राजा को भी ढूंढकर महल में बुलाया। उन्हें स्नान करवाकर नए वस्त्र पहनाए गए और सम्मानपूर्वक भोजन कराया गया। इसके बाद दमयंती ने श्रद्धा से दशा माता का व्रत और पूजन किया। माता की कृपा से धीरे-धीरे उनके अच्छे दिन लौट आए। कुछ समय बाद वे अपने राज्य लौटने के लिए रवाना हुए।
रास्ते में जब वे उन स्थानों से गुजरे जहां पहले घटनाएं हुई थीं, तब दोनों ने एक-दूसरे को सच्चाई बताई। बहन के गांव पहुंचकर दमयंती ने धरती माता से प्रार्थना की और जहां उसने कांदा-रोटी दबाई थी, वहां से वह सोने-चांदी में बदलकर निकली। आगे चलकर वे मित्र के घर भी गए, जहां आधी रात को वही खूंटी हार उगलने लगी और सच्चाई सामने आ गई।
अंत में वे भील राजा के पास पहुंचे और अपने बच्चों को वापस लिया। जब नल और दमयंती अपनी राजधानी लौटे तो नगरवासियों ने उनका भव्य स्वागत किया। दशा माता की कृपा से राजा का राज्य, वैभव और सुख-समृद्धि फिर से लौट आई। इस प्रकार यह कथा बताती है कि देवी का अपमान करने से जीवन में कष्ट आते हैं, जबकि श्रद्धा और भक्ति से सब कुछ फिर से प्राप्त हो सकता है।